Sunday, 1 May 2011

जल प्रदूषण

Saturday, 30 April 2011

HINDI TEXT BOOK 2011

Flashing hot - Click image to download.दसवीं कक्षा की नई पाठपुस्तिका प्रकाशित की है।
डौमनोड़ केलिए क्लिक करें

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Thursday, 28 April 2011

नदी और साबुन

Saturday, 23 April 2011

नदी

केंद्रीय शैक्षिक प्रौद्योगिकी संस्थान, एनसीईआरटी

यह ओडियो केंद्रीय शैक्षिक प्रौद्योगिकी संस्थान और एनसीईआरटी द्वारा बनाई गयी है। पर्यावरण संकलन में 'नदी' अपनी व्यथा सुना रही है। सुनने के लिये क्लिक करें....

Wednesday, 20 April 2011

ज्ञानेन्द्रपति

ज्ञानेन्द्रपति हिन्दी के एक विलक्षण कवि-व्यक्तित्व हैं, यह तथ्य अब निर्विवाद है। कवि-कर्म को ही जीवन-चर्या बनाने वाले ज्ञानेन्द्रपति की प्रतिष्ठा का आधार संस्थानों तथा महाजनों की सनदें और पुरस्कारों की संख्या नहीं, बल्कि कविता-प्रेमियों की प्रीति है, जिसे उनकी कविता ने जीवन-संघर्ष के मोर्चों पर मौजूद रहकर और ‘अभिव्यक्ति के ख़तरे’ उठाकर अर्जित किया है।
वे उन थोड़े से कवियों में हैं, जिनके बल पर कविता की तरफ़ से जनता का जी उचटने के बावजूद, समकालीन कविता के सार्थक की विश्वसनीयता बरक़रार है।

ज्ञानेन्द्रपति की अप्रतिमता के कारकों में अवश्य ही यह तथ्य है कि उसकी जड़ें लोक की मन-माटी में गहरे धँसी हैं और उसकी दृष्टि विश्व-चेतस् है। जीवन-राग उनकी कविता में लयात्मकता में ढल जाता है। वे गद्य कविता के नहीं उस मुक्तछन्द के कवि हैं निराला ने जिनकी प्रस्तावना की थी।

उनकी कविता आद्यन्त छान्दिक आवेग से ओतप्रोत है, बल्कि उसकी संरचना उसी से निर्धारित होती है। बेशक, यह हर बार एक नए छन्द का अन्वेषण है जो कविता के कथ्य के अनुसार जीवन-दृव्य के साथ कवि-चित्त की एकात्मा से सम्भव होता है। हिन्दी की विशाल भाषिक सम्पदा का सार्थक संदोहन भी उनके यहाँ खूब बन पड़ा है। तद्भव-सीमित रहना उनकी कविता की मजबूरी नहीं, उसके लिए न तो तत्सम अछूत है, न देशज अस्पृश्यः, अवसरानुकूल नये शब्दों के निर्माण की उसकी साहसिकता तो कुख्यात होने की हद तक विख्यात है। ज्ञानेन्द्रपति की कविता एक ओर तो छोटी-से-छोटी सचाई को, हल्की-से-हल्की अनुभूति को, सहेजने का जतन करती है, प्राणी-मात्र के हर्ष-विषाद को धारण करती है; दूसरी ओर जन-मन-भूमि पर दृढ़ता से पाव रोपे सत्ता-चालित इतिहास के झूठे सच के मुकाबिल होती है। धार्मिक सत्ता हो या राजनीतिक सत्ता वह किसी को नहीं बख्शती। उसकी दीठ में संतप्त भूगोल है। साम्राज्यवाद के नये पैतरों को वह पहचानती है। अभय में पगी हुई करुणा उसे विरासत में मिली है। वह एक महान् परम्परा की परिणति है।

Saturday, 16 April 2011

नई कविता - कवि स्वयं सुनाती है



Thursday, 14 April 2011

महादेवी वर्मा एक सफल रेखाचित्रकार

महादेवी वर्मा की लोकप्रिय पुस्तक – मेरा परिवार।
महादेवी वर्मा का पशु-प्रेम जग-जाहिर है। इस पुस्तक में महादेवी जी ने उत्कृष्ट कहानियों का संकलन किया है। यह सभी कहानियाँ वन्य जीवन पर आधारित है।
महादेवी वर्मा एक सफल रेखाचित्रकार, कवयित्री, और विचारक है। उन्होंने कई रेखाचित्र लिखें हैं जिनमें नीलकंठ मोर, घीसा, सोना, गौरा आदि काफ़ी प्रसिद्ध हैं। मानव एक श्रेष्ठ प्राणी होने पर भी पशुओं के प्रति उसका व्यवहार सराहनीय नहीं हैं। उनके द्वारा रचित सोना और गौरा नामक रेखाचित्र में मानव के निष्ठुर व्यवहार पर महादेवी वर्मा ने प्रकाश डाला हैं। पशु-पक्षी भी प्रेम के लिए ललायित रहते हैं और प्रेम दिखाने पर आनंदविभोर हो उठते हैं। बेजुबान होने पर भी स्नेह के कई मूक प्रर्दशन होते हैं। अपने असीम आनंद की अभिव्यक्ति सुंदर आँखों के भाव से प्रकट करते हैं। परन्तु मानव अपने स्वार्थ के कारण इन बेजुबान जानवरों पर इतना अत्याचार और निर्दय व्यवहार करता है और उन पर कितना जुल्म करता है इसका कोई अंत नहीं। मानव द्वारा इतनी यातना सह कर भी पशु मानव के स्वभाव से अब तक अनजाना है। मानव का यह स्वार्थ अंत में वेदना का कार्य और कारण बन जाता है, इसी बात पर प्रकाश डालना ही महादेवी वर्मा का मुख्य ध्येय है