Monday, 22 August 2011

एक डॉक्टर जंगल में...(Thanks to MATHRUBHUMI DAILY)

जो सोता है,वह खोता है। जागृत व्यक्ति का जीवन ही सफल बनता है।जो कर्मनिरत रहते हं,वे महान बन जाते हैं।ऐसी ही एक महान विभूति से परिचय पाएँ।
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Monday, 15 August 2011

दवा

प्रिय डॉक्टेर्स का असली मसयालम रूप! मरुन्नु का चौथा अध्याय

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Saturday, 13 August 2011

कण्णूर से...6

लक्षमणनजी की चिड़िया डौनलोड्स पन्ने में

Friday, 12 August 2011

कण्णूर से...5

  • इसका ओ.डी.डी. और पी.डी.एफ. दोनों रूप डौनलोड्स पन्ने में
  • pullikkanakkunsshs के लतिकाजी से मिले पारिभाषिक शब्द  डौनलोड्स पन्ने में

Thursday, 11 August 2011

प्रिय डॉक्टेरस...

Friday, 5 August 2011

नाक शब्द से युक्त मुहावरों का संकलन


नाक ऊँची होना - അന്തസ്സ് വര്‍ദ്ധിക്കുക
नाक कटना - മാനം കെടുക
तुम्हारे इस दुराचरण से इस परवार की नाक कट गई है - प्रेमचंद
नाक का बाल - അടുത്ത സുഹൃത്ത്

जैसे --- एक जवान अफसर ने इसे जेल में बंद कर दिया था पर दूसरे दिन
                          सबेरे वह छोड़ दिया गया था,क्योंकि वह एक नेता की नाक का बाल था। 
                                                                  – गिरिधर गोपाल
नाक काटना - മാനം കെടുത്തുക
  जैसे--- तू हमारे नाक कटाने पर लगी हुई है - प्रेमचंद
नाक कान काटना - കഠിനമായി ശിക്ഷിക്കുക
नाक काट देना - അഭിമാനം നഷ്ടപ്പെടുത്തുക
जैसे --- वादा न निभाकर उन्होंने खानदान की नाक काट दी है – भूषण वनमाली
नाक की सीध में - നേരേ മുന്നില്‍

Sunday, 31 July 2011

चरक (विकीपीड़िया से)

चरक एक महर्षि एवं आयुर्वेद विशारद के रूप में विख्यात हैं। वे कुषाण राज्य के राजवैद्य थे। इनके द्वारा रचित चरक संहिता एक प्रसिद्ध आयुर्वेद ग्रन्थ है। इसमें रोगनाशक एवं रोगनिरोधक दवाओं का उल्लेख है तथा सोना, चाँदी, लोहा, पारा आदि धातुओं के भस्म एवं उनके उपयोग का वर्णन मिलता है। आचार्य चरक ने आचार्य अग्निवेश के अग्निवेशतन्त्र मे कुछ स्थान तथा अध्याय जोड्कर उसे नया रूप दिया जिसे आज हम चरक संहिता के नाम से जानते है।
चरकसंहिता आयुर्वेद में प्रसिद्ध है। इसके उपदेशक अत्रिपुत्र पुनर्वसु, ग्रंथकर्ता अग्निवेश और प्रतिसंस्कारक चरक हैं।
प्राचीन वाङ्‌मय के परिशीलन से ज्ञात होता है कि उन दिनों ग्रंथ या तंत्र की रचना शाखा के नाम से होती थी। जैसे कठ शाखा में कठोपनिषद् बनी। शाखाएँ या चरण उन दिनों के विद्यापीठ थे, जहाँ अनेक विषयों का अध्ययन होता था। अत: संभव है, चरकसंहिता का प्रतिसंस्कार चरक शाखा में हुआ हो।
चरकसंहिता में पालि साहित्य के कुछ शब्द मिलते हैं, जैसे अवक्रांति, जेंताक (जंताक - विनयपिटक), भंगोदन, खुड्डाक, भूतधात्री (निद्रा के लिये)। इससे चरकसंहिता का उपदेशकाल उपनिषदों के बाद और बुद्ध के पूर्व निश्चित होता है। इसका प्रतिसंस्कार कनिष्क के समय 78 ई. के लगभग हुआ।
त्रिपिटक के चीनी अनुवाद में कनिष्क के राजवैद्य के रूप में चरक का उल्लेख है। किंतु कनिष्क बौद्ध था और उसका कवि अश्वघोष भी बौद्ध था, पर चरक संहिता में बुद्धमत का जोरदार खंडन मिलता है। अत: चरक और कनिष्क का संबंध संदिग्ध ही नहीं असंभव जान पड़ता है। पर्याप्त प्रमाणों के अभाव में मत स्थिर करना कठिन है।